अंग्रेज अफसरो की याद दिला गए कलेक्टर राजीव चंद्र दुबे

Updesh Awasthee
प्रसंगवश@ललित मुदगल/शिवपुरी। आज शिवपुरी के नए कलेक्टर के रूप ओपी श्रीवास्तव ने चार्ज ले लिया। कलेक्टर राजीब चंद्र दुबे के रिलीव होते ही आप पार्टी ने शहर में मिठईयां बांटकर और आतिशबाजी कर जश्र मनाया। यह शायद पहली बार-हुआ होगा कि किसी कलेक्टर के ट्रांसफर पर मिठाईयां सर्वाजनिक रूप से चौराहों पर बंटी हो। अब बता चल गई है तो, आज यह इस प्रसंग का भी उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा की कलेक्टर दुबे जनसुनवाई में आम आदमी से अंग्रेजों का सा बर्ताव करते थे। 

उनका यह जुमला काफी चर्चा में रहता था कि यह काम मेरे बस का नही है। बीते रोज तो कलेक्टर शिवुपरी ने शहर की कुछ छात्राओं को जब एफआईआर की धमकी दी तो शहर के बुद्विजीवियों के मन में आजादी के पहले की कोई पिक्चर चल गई होगी। उस समय में ऐसा ही होता था। गुलाम भारतीय यदि कलेक्टर के सामने उनके प्रशासन कमियां लेकर पहुंचे तो उन्हे जेल में डाल दिया जाता था। 

कुछ आजादी-सी की बात कर दी हो, अपना हक मांगने आए हो तो अग्रेंज अधिकारी पहले तो उनसे मिलता ही नही है और आए हुए लोग ज्यादा दबाव बना रहे तो किसी अधिनस्थो को भेज दिया हो, फिर भी भारतीय बडे साहब से मिलने की जिद पर अड गए हो तो उन्हे जैल भेजने की धमकी दी जाती है और अग्रेजी पुलिस भी बुला ली जाती हो।

कुछ ऐसा कलेक्टर राजीव चंद्र दुबे के कार्यकाल में हुआ था। बीते 18 जुलाई को शहर के 1 सैकड़ा लॉ स्टूडेंट अभय जैन के नेतृत्व में कलेक्टर से शहर की सड़को में हो चुके जानलेवा गढडो से आजादी के लिए मिलने गए लेकिन कलेक्टर राजीव दुबे कार्यालय में मौजूद होने के बावजूद उनसे मिलने के लिए बाहर आना तक मुनासिब नहीं समझा। 

शिवपुरी कलेक्टर लगातार अपने प्रतिनिधि छात्रों के बीच भेजते रहे, लेकिन छात्र कलेक्टर को बुलाने की मांग पर अड़े रहे। कलेक्टर के इस रवैये से आक्रोशित होकर छात्र-छात्राओं के इस दल ने जमकर नारेबाजी की। छात्र नारेवाजी सड़को के गढडो से आजादी के नारे लगा रहे थे तो कलेक्टर के प्रतिनिधि उन्हे जेल भिजवाने की धमकी से भी नही चूक रहे थे। जब नारे बाजी हो रही थी तो पुलिस भी कलेक्टर में आ गई थी। 

हद तो तब हो गई जब कलेक्टर राजीव दुबे अचानक कलेक्ट्रेट से बाहर निकले और छात्र छात्राओं की भीड़ को चीरते हुए अपने वाहन में बैठकर रवाना हो गए। कलेक्टर के इस रवैये से न सिर्फ छात्र-छात्राए बल्कि उपस्थित पत्रकार भी सन्न रह गए। यह नाजारा बिल्कुल बैसा ही था जैसा गुलाम भारतीय का हाल अंग्रेजो के शासन काल में था। 
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