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वर्षायोग का पल-पल अनमोल होता है: मुनिश्री अभयसागर महाराज

Muni shri Abhay Sagar ji maharaj
शिवपुरी। चातुर्मास का पल पल बहुत बहुमूल्य होता है। इस काल में व्यक्ति चाहे तो अपनी आत्मिक उन्नति कर सकता है। जहां तक चातुर्मास की बात है इस समय व्यक्ति को जहाँ काम धंधे की अत्यधिक व्यस्तता नहीं रहती वहीं वह अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिये स्वतंत्र रहते है।

अत: यदि वह इस चार माह के चातुर्मास काल में जीवन जीने की कला के रूप में धर्म की क्रियाओं से जुड़कर संस्कार ग्रहण करें तो यह चातुर्मास उनके जीवन के लिये बहुमूल्य सावित होगा। उक्त मंगल प्रवचन संत शिरोमणी आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री अभय सागर जी महाराज ने श्री महावीर जिनालय में चातुर्मास कलश स्थापना के अवसर पर हुयी विशाल धर्मसभा में दिये।

धर्मसभा को संबोधित करते हुये मुनिश्री ने कहा चातुर्मास का काल संयम का काल होता है। जहाँ मुनि जीव रक्षा के लिये एक जगह पर रहकर अपना धर्मध्यान करता है वहीं श्रावक भी मुनि सानिध्य में रहकर अपना जीवन का उत्थान कर सकता है।

आप इस बर्षायोग में अपनी आत्मा के उत्थान का कार्य करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जव पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के चरण इस क्षेत्र में पडेंगे और शिवपुरी के लोग न सिर्फ उनकी आगवानी करेंगे वरन उनके धर्मोपदेश को सुनकर अपना कल्याण करेंगें।

धर्मसभा के दौरान पूज्य मुनिश्री प्रभातसागर जी महाराज ने कहा कि चार माह के दौरान आप न सिर्फ धार्मिक संस्कारों को ग्रहण करें वरन स्वयं त्याग करके अपने जीवन को भी उन्नत बनाने का प्रयत्न करें।

वहीं पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने अपने उद्बोदन में कहा कि कि आज जिसप्रकार हम इतनी सं या में अपनी भक्ति प्रदर्षित करने दूर-दूर से यहाँ एकत्रित हुये हैं, इसी  प्रकार अपनी लगन गुरू और प्रभु से लगाये रखें तो निष्चित ही हम अपने जीवन का कल्याण कर सकते हैं।

आज चातुर्मास का प्रथम कलश सेठ वचनलाल देवेन्द्र कुमार पत्ते वालों को, द्वितीय कलश , राजकुमार जड़ीबूटी एवं तृतीय कलश चौ. रिषभ कुमार अजित कुमार जैन के परिवार ने स्थापित करने का सौभाग्य प्राप्त किया।

इसके अलावा आठ अन्य लोगों को भी कलश स्थापना का सौभाग्य मिला। मंगलाचरण पाठशाला की बहनों, डॉ. एच. पी. जैन एवं कु. मेहुल जैन ने किया। धर्मसभा का संचालन विनय भैयाजी खनियाधाना, संजीव बांझल एवं राजेश बोटा ने संयुक्त रूप से किया।
Muni shri Abhay Sagar ji maharaj