ये कांग्रेस की जीत नहीं, मुन्ना का गुडलक है और भाजपा की गफलत भी

shailendra gupta
शिवपुरी। नगरपालिका अध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मुन्नालाल कुशवाह जीत अवश्य गए लेकिन उनकी विजय में कांग्रेस की जीत की झलक नहीं, बल्कि भाजपा की हार का पुट अधिक दिख रहा है।

मुन्नालाल की जीत को हम कांग्रेस की जीत क्यों मानें? जबकि कांग्रेसियों का एक बड़ा वर्ग खुलकर मटके (बागी प्रत्याशी) की ताल ठोक रहा था। एक बागी बैलगाड़ी में सवार हो गया था और कांग्रेस के परंपरागत मतों में बसपा के हाथी और समाजवादी पार्टी की साइकिल ने सेंध लगा दी थी।

इसके बावजूद भी किस्मत के धनी मुन्नालाल जीत गए तो इसका एकमात्र कारण है कि भाजपा ने आसानी से हथियार डाल दिए थे या यूं कहें भाजपा ने समर्पण कर दिया था। युद्ध में रक्षात्मक रणनीति बनाने का अर्थ ही हार को स्वीकार करना होता है और भाजपा ने पूरा चुनाव अपने आप को बचते बचाते हुए लड़ा।

इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा के खाते से उसके परंपरागत वोट भी खिसक गए। भाजपा की हार इसलिए भी दुखदाई है, क्योंकि कांग्रेस के गढ़ों में तो भाजपा प्रत्याशी हरिओम राठौर ने अपनी इज्जत बचाई है, लेकिन भाजपा अपने घर के वार्डों में चीरहरण का शिकार हो गई।

कांग्रेस के लिए इस चुनाव का सबसे पहला सबक यह है कि उसे इठलाने की जरूरत नहीं है। चुनाव में मतदाता ने भाजपा को नकारा हो यह किसी भी कोण से नहीं कहा जा सकता। यदि ऐसा होता तो 39 सदस्यीय परिषद में सर्वाधिक 18 पार्षद भाजपा के नहीं होते। मतदाता ने पार्षद तो भाजपा का बनाया है, लेकिन अध्यक्ष पद पर पार्टी प्रत्याशी से किनाराकशी की है?

इसके लिए पार्टी को मंथन करना होगा कि आखिरकार ऐसा क्यों हुआ? चुनाव भाजपा इसलिए हारी, क्योंकि वह दुविधा में चुनाव लड़ी। चुनाव पूर्व और चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी न तो खुलकर नगरपालिका अध्यक्ष रिशिका अष्ठाना का समर्थन कर पाई और न ही खुलकर विरोध।

भाजपा इसलिए हारी क्योंकि किसी एक पक्ष में खड़ा होने की वह हिम्मत नहीं दिखा पाई। यदि भाजपा नपाध्यक्ष के पक्ष में खड़ी होती तो भी इसका लाभ भाजपा को मिल सकता था और यदि विपक्ष में होती तो इसे भी भुनाया जा सकता था। चुनाव के पूर्व जब नपाध्यक्ष पर कार्रवाई का मौका था। कलेक्टर ने पीआईसी सदस्यों के खिलाफ पद से हटाने हेतु नोटिस जारी कर दिए थे। शासन ने नपाध्यक्ष को नोटिस जारी कर दिया था। तब पार्षदों और अध्यक्ष को हटाने की हिम्मत भाजपा नहीं जुटा पाई।

यदि पार्टी की कोई स्पष्ट नीति होती और उच्च न्यायालय की दृष्टि से दोषी पार्षदों और अध्यक्ष पर गाज गिरती तो जनता के बीच यह संदेश लेकर जाया जा सकता था कि भाजपा अपने लोगों को भी नहीं बख्शती है और इसका चुनाव में वह फायदा उठा सकती थी। चलिए मानिए आपने अपने अध्यक्ष और पार्षदों का बचाव किया तो फिर चुनाव में नपाध्यक्ष को अछूत क्यों बना दिया गया।

चुनाव में नपाध्यक्ष नहीं दिखीं तो यही माना गया कि उन्हें दूर रखा गया है और नपाध्यक्ष के कार्यकाल के विषय में भाजपा खुद संतुष्ट नहीं है। इसीलिए तो कार्यकर्ताओं को यह कहना पड़ा कि मोदी और शिवराज फेक्टर के आधार पर मतदाता के बीच जाकर उनसे वोट मांगें जाएं। स्थानीय चुनाव में मोदी और शिवराज फेक्टर का क्या अर्थ है? यह मतदाता को समझ में नहीं आया।

भाजपा मतदाताओं के बीच यह बात भी पहुंचाने में असफल रही कि नगर में उड़ रही धूल के लिए वह जि मेदार नहीं है और अगर जि मेदार है भी तो उड़ती हुई धूल प्रसव पीड़ा के समान है। सीवेज प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन के लिए धूल उडऩा स्वाभाविक है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि भाजपा ने शुरू से ही हारी हुई लड़ाई लड़ी। यही कारण रहा कि कांग्रेस के विरोध में अनेक अवरोध खड़े थे, लेकिन फिर भी वह उनसे पार पाने में सफल रही।

कांग्रेस के वोट बैंक में सबसे अधिक सेंध लगाने का काम पार्टी के बागी और निर्दलीय उम्मीदवार छत्रपाल सिंह गुर्जर ने किया। जिनके पक्ष में कांग्रेस के अनेक नेता कार्य कर रहे थे और श्री गुर्जर ने 10 हजार से अधिक मत प्राप्त कर कांग्रेस प्रत्याशी मुन्नालाल को सीधा नुकसान पहुचाया।

कांग्रेस के लिए बसपा प्रत्याशी लक्ष्मण त्यागी का खड़ा होना भी काफी नुकसानदायक रहा। श्री त्यागी साढ़े तीन हजार से अधिक दलित मतदाताओं के वोट समेट ले गए और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी अफजल खान ने अल्पसं यक वर्ग के लगभग तीन हजार वोट अपने कब्जे में कर कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया था। लेकिन इसके बाद भी मुन्नालाल जीते तो उन्हें भाजपा के कमजोर प्रबंधन को अपनी जीत के लिए धन्यवाद देना चाहिए।

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