संस्कारों की कमी ही बनती है भटकाव का कारण

shailendra gupta
शिवपुरी- आज की युवा पीढ़ी संस्कारों से दूर होती जा रही है। हमने अपने बच्चों को पैसा तो दिया, पर संस्कार देना भूल गये है। आज हमने अपने बच्चों को पैदा करके बस छोड़ दिया है।
उन्हें बाहर तो भेज दिया, पर बाहर जा कर बो क्या कर रहा है ये देखना भी उचित नहीं समझते, और यही कारण है आज की पीढ़ी दुवर््यसनों में फंसती जा रही है। यदि आज समय रहते तुम नहीं संभले, और अब भी अपने गुरू की बात नहीं मानी तो तुम्हारी संतान भी तुम्हारी बात नहीं मानने बाली। उक्त प्रवचन परम पूज्य संत षिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के परम प्रभावक षिष्य मुनि श्री 108 कुंथु सागर जी महाराज ने महावीर जिनालय में अपने बिषेष प्रवचनों के दौरान दिये।

आज की युवा पीढ़ी संस्कारों से दूर होती जा रही है। आज उनका मन मोबाइल, लैपटॉप, टी.बी. इंटरनेट में तो लगता है पर मंदिरों मे और धर्म में नहीं लगता। आज पुरानी संस्कारों वाली कहानियां तो सब समाप्त हो गई, और संस्कारों को हरण करने वाली कहानियां षुरू हो गई है। आज के बच्चों के संस्कारहीन होने के पीछे कसूर बच्चों का नहीं बल्कि माता पिता का है। हम खुद तो पाप में फंसे है, और बच्चों को भी पाप में फंसाना चाहते है। इसलिये हम डबल पापा (पाप में फंसे है। तो डबल पापा ) हो गये। हम अपने बच्चों को कोचिंग, हॉस्टल में, तो भेजते हैं, पर मंदिर नहीं भेजते, और तो और महिलायें फैषन और ब्यूटी पार्लर में ऐसी बिजी है। कि सब संस्कृति भूल गईं, अरे षादी के बाद भी अब किसे रिझाना चाहती हो।

जब हम स्वयं ही संस्कारी नहीं होंगे तो बच्चों में संस्कार आयेंगे कहां से? महाराज श्री ने उदाहरण देते हुये बताया कि एक लड़की ने प्रष्न किया महाराज षराब और षरबत में क्या अंतर है। दोनों अंगूर से बनते है। ये तो भाव आज की पीढ़ी के है। मैनें उस लड़की को इतना ही जबाब दिया कि तुम्हे अपना भाई गले लगाये और एक मवाली तुम्हें गले लगाये इसमें क्या अंतर है। उतना ही अंतर है षरवत और षराब में है। जैसे तुम्हारे भाई का गले लगाना धर्म ह,ै मबाली का गले लगाना अधर्म है अनीति है। वैसे ही अंगूर को सड़ाके बनी षराब को पीना अनीति है अधर्म है। अंत में उन्होनें कहा जो माता पिता अपने बच्चों में संस्कार नहीं डालते उन्हें आगे पछताना ही पड़ेगा। जैसे तुमने षहरों में उन्हें छोड़ दिया है। बैसे ही बे भी तुम्हें छोड़ देंगें ये बिल्कुल निष्चित है। अपना भला चाहते हो तो अपने धर्म, गुरू और संस्कारों पर बहुमान करना सीखो बरना तुम्हे तिरस्कार ही मिलेगा और कुछ नहीं।

उन्होंने आगे कहा कि, आज कम उम्र में ही इंसान इस दुनिया से चला जाता है, इसका कारण यही है कि आज हमारे जीवन में संयम रहा ही नहीं। बिना ़ऋतुओं के फल आ रहे हैं और हम खाते जा रहे है। आज के इंसान ने अपना पेट कचरे का डिब्बा बना रखा है। कुछ भी खाने के पूर्व वह यह भी बिचार नहीं करता कि ये बस्तु खाने के लायक है भी या नहीं। सब खाता चला जा रहा है। जानवर भी जो खाना पसंद ना करे वो भी खाता चला जा रहा है। विवके रहा ही नहीं हमारे पास। जीभ के स्वाद के लिये जीव को तक खाता जाता है। चौबीस घंटे खा रहा है। गुटखा, तम्बाखू, चरस, गांजा, भांग सब चाव से खा रहा है। जिस प्रकार कचरे के डिब्बे को नगर पालिका बाले उठा ले जाते है। बैसे ही एक दिन तुम्हे नरक पालिका के कर्मचारी आयेंगे और उठा ले जायेंगें। भक्ष्य- अभक्ष्य में विवेक रखो बरना तुम्हें बचाने बाला कोई नहीं है।

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