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​तलवार के एक ही बार से हाथी की सूड काट हाथियो के सामने खाडेराव ऐसे पैर जमा कर खडे थे जैसे रावण की सभा में अंगद

कंचन सोनी/शिवुपरी। खाडेराव की योजना के अनुसार नदी के तीर पर सारे प्रबंध हाथी पकडने के लिए दूसरे दिन ही कर दिये गये। सूर्योदय के साथ आजम दोनो राजकुमारो को साथ लेकर मचान पर जाकर बैठ गया। आजम के आग्रह पर उसकी पत्नि सलमा और शहजादी जेबुन्निसा भी गई थी शिकार को देखने के लिए, उनके लिए अलग से मचान की व्यवस्था की गई। 

शहजादे आजम,खाडेराव और गजंसिह का मचान  सलमा और जेबुन्निसा के मचान की पास ही था। सभी सांस रोककर हााथियो के आने की प्रतीक्षा करने लगे। खाडेराव शिकार की योजना मन ही मन में बना ही रहे थे तभी झाडियो से आवाज आने लगी। तभी सभी ने देखा कि तमाम छोटे पेड ओर झाडियो को रौदंते हुए हाथियो का एक विशाल झुंड जिनकी संख्या करीब 25 के आसपास होगी,नदी के किनारे की ओर बड रहा था। 

एक विशाल पूर्ण व्यस्क हाथी इस झुडं का नेतृत्व कर रहा था। उसके पीछे हथनिंया थी जो सभंवत:उसकी पत्निया होंगीं। बताते है कि हाथी एक ऐसा पशु है जीवन भर परिवार बना कर रहता है। खाडेराव रासो में कवि ने लिखा है कि हाथी उसके पीछे उसकी पत्निया और उसके पीछे झुंड चल रहा था। 

ऐसा लगता था,जैसे वह हाथियो का छोटा सा दल किसी छोटी सैनिक टूकडी की भांति अनुशासन मे चल रहा था। हाथियो ने अपने राजा के सम्मान में उचित दूरी बना रखी हों। नदी के किनारे पर जाते ही गजराज के पैर जाल में फस गए उसकी दोनो हाथिनी भी जाल की सीमा में जा चुकी थी। अपने आप को फसता देख गजराज जोर से चिघाडने लगा,तो बाकी हाथी सचेत होकर वही रूक गए।

गजराज अपनी हथिनी समेत जाल को अपनी सूड से तोडने का प्रयास करने लगा। अन्य हाथी भी जाल को पकडकर अपनी सूड से खीचकर तोडने का प्रयास करने लगे। शहजादे और शहजादी सहित सभी मुगल सैनिक इस दृश्य को देख रहे थे। भयकंर गर्जना करते हाथियो के पास जाने की किसी की भी हिम्मत नही हो रही थी,ओर हाथी लगभग सूड से जाल तोड ही दिया था। खाडेराव ने सोचा अगर जल्द ही कुछ नही किया गया तो जाल में फसे हाथी निकल जाऐंगें और सारी मेहनत व्यर्थ ही चली जाऐगी। 

खाडेराव ने कुछ विचार किया और अचानक अपनी तलवार को हाथ में लेकर मचान से कूंद गए। और बिजली की गति से जाल तोडते हुए हाथी के सामने अपनी तलवार लहराते पहुंच गए और अपनी तलवार से हाथी के सूड पर वार कर दिया। हाथी की सूड कट कर अलग हो गई,हाथी के सूड से खून की फब्बारे छुट रहे थ। 

अपने गजराज पर आक्रमण होते देख बाकी हाथी सूड उठाए खाडेराव पर अक्रमण की मुद्रा में खडे हो गए। खाडेराव तलवार उठाए इन हाथियो के सामने अकेले ही खडे थे। हाथियो ने खाडेराव का साहस तेख आक्रमण की मुद्रा से बचाव की मुद्रा कर ली। फिर खाडेराव ने उस हाथी पर बिजली की गति से अपनी तलवार से बार किया जो अपने राजा को बचाने का प्रयास कर रहा था। 

खाडेराव रासो में कवि ने लिखा है कि वीरवर खोडराव ने यह कुछ इतनी गति से किया कि आजम और उसकी बेगम सलमा और उसकी बहन जेबुन्निसा और मुगल सैनिको को कुछ समझ में नही आया। आजम ने सोचा कि इस समय खाडेराव के प्राण संकट में हैं,अगर हााथियो ने आक्रमण कर दिया तो कोई भी शक्ति उसके प्राण नही बचा सकती,किसी भी समय हाथी आक्रमण कर सकते थे।

आजम को पूरी तरह समझ में आ गया कि खाडेराव के प्राण संकट में है उसने चिल्लाते हुए अपने सैनिको से कहा कि जल्द ही हाका लगाओ,आजम की आवाज सुनकर गजसिंह की भी तंत्रा टूटी और उसने अपने सैनिको से कहा कि हांका करो। झाडियो से सैनिक निकले और ढोल नगाडो और भालो के साथ आगे बडे,अचानक हुई तेज आवाजो के कारण हाथियो का झुण्ड घबरा गया। 

हाथियो का ध्यान खाडेराव की ओर से हट गया। सैनिको ने घायल हाथी और जाल में फसी हथनी के उपर जाल और फैक दिए और कसने का प्रयास करने लगे। जाल में फसे हाथियो ने सघंर्ष करना बंद कर दिया तो सैनिको ने उनके पैरो में बेडिया बांध दी। 

विजेता खाडेराव ऐसे खडे थे जैसे कि अंगद ने रावण की सभा में अपने पैर जमा दिया हो।जेबुन्निसा इस वीर युवक को देखती रह गई। उसका देवदूत जैसा विशाल देहकार भव्य ओर तेजस्वी मुख,बडी—बडी चमकती आखें,लम्बे केश,लम्बी भुजाए ओर चौडी छाती और इस अदभुत वीरता के धनी युवक को जेबुन्निसा देखती ही रह गई।

खाडेराव रासी में कवि ने लिखा है कि जेबुन्निसा का कुवांरा मन खाडेराव की इस वीरता भरे गुण पर मोहित हो गई। उधर आजम भी खाडेराव की इस वीरता को देखकर उसने भी निश्चय कर दिया कुछ इस क्षेत्र का सेनापति खाडेराव का बनाना है बस दक्षिण में जाकर सम्राट से आज्ञा लेनी हैं।

कहानी आगे कंमश रहेगी, आगे खाडेराव रासो ने इस शिकार का वर्णन अपनी कल्पनाओ में लिखा है कि खाडेराव जब गजराज के समझ अपनी तलवार लेकर खडे थे,तो सक्षात भगवान परशुराम लग रहे थे। जेबुन्निसा भी खाडेराव को लेकर अपने प्रेम के पंखो को लगाकर उडने लगी थी। 
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