मैं शिवपुरी हूं, मुझे द्रोण नही, चाणक्य चाहिए

मैं शिवपुरी हूं, पूरा देश आजादी के जश्र की तैयारी कर रहा है। मेरे आंगन में भी यही जश्न मनाया जाएगा। फूल बरसेंगे, झंडा फहराया जाएगा। लोग संघर्ष के दिनों को याद करेंगे और 'शुक्र की आह' भरकर आजादी का एहसास करेंगे, लेकिन मैं सोच रहीं हूं कि क्या मैं सचमुच आजाद हूं। 300 साल पहले मैं एक हराभरा वन प्रदेश हुआ करती थी। अर्जुन, नकुल और सहदेव ने मेरी ही गोद में अज्ञातवास बिताया। हजारों ऋषि, मुनि तप करने आते थे, सिद्धियां प्राप्त करके चले जाते थे। पहाड़ियों के बीच कलरव करते झरने, अठखेलियां करते हिरण और शिकार की तलाश में छुपा शेर, ना जाने कितने ही प्राणी स्वतंत्रता से मेरे आगोश में जीवन यापन किया करते थे। मैं बहुत खुश थी। सबकुछ फल फूल रहा था। 

फिर एक इंसान आया। लोग उसे माधौ महाराज बुलाते थे। उसने मेरे आंगन से हरे हरे वृक्ष काट दिए, लेकिन भव्य आलीशान महल और भवन बनाए। सड़कें बनाईं। वर्षा के जल को संचित करने के लिए जलाशय बनाए। एक बड़ी झील बनाई। अब मैं एक सुन्दर शहर हो गई थी। उस राजा के जीवन की सबसे सुन्दर कृति हुआ करती थी। उसका भी बड़ा लगाव था। ग्रीष्मकाल में वो मुझे अपने राज्य की राजधानी बना दिया करता था। उसने मुझे वनप्रदेश से अत्याधुनिक शहर बना दिया था। रेलगाड़ी भी मेरे अंगने में सीटी बजाती थी। मैं अपने सौंदर्य और समृद्धता पर बड़ी इतराया करती थी। 

फिर जयघोष हुए, लोग एक दूसरे को बधाईयां दे रहे थे। देश आजाद हो गया। लोकतंत्र आ गया। चुनाव होने लगे। सरकारें बनने लगीं। आबादी बढ़ने लगी। पढ़े लिखे प्रोफेशनल अधिकारी आने लगे। लोग यहां आते थे, वोट लेकर चले जाते थे। कुछ नौकरी करने आते थे तो कुछ दूसरे लक्ष्यों को लेकर आते थे। सब अपने अपने टारगेट अचीव करने में लगे रहते थे। कईयों ने किए भी। मेरी गोद में खेलकर बड़े हुए, इतने बड़े हो गए कि अब दिखाई भी नहीं देते। 

लेकिन इन 70 सालों में मुझे प्रेम करने वाला एक भी नहीं आया। हां, मेरे विकास के वादे मैने भी कई बार सुने। आज मेरे अस्तित्व पर उन तमाम लोगों का राज है, जो ना तो मुझे जानते हैं और ना ही मुझसे प्रेम करते हैं। मेरे सीने को चीरकर पत्थर निकाल ले जाते हैं। मेरी लहलहाती हरियाणी उनके लिए करोड़ों की कमाई का जरिया है। मेरे आंगन में बने ताल, तलैया और झील की किसी को परवाह नहीं है। आजादी से पहले इस अंगने में चमचमाती सड़कें हुआ करतीं थीं, अब असहनीय दर्द पहुंचाते गड्डे कदम कदम पर मौजूद हैं।  मैं कराह रही हूं, छटपटा रही हूं। असहनीय दर्द से तड़प रही हूं। मैं मां हूं, मेरे ही बेटे मेरा आंचल फाड़ रहे हैं। मेरा मुकुट गिरा दिया है। मेरी भुजाओं में गहरे जख्म हैं। मेरी धमनियों में मलवा जमा दिया गया है। मेरा सारा श्रृंगार मिटा दिया। मैं सुहागन हूं, मुझे विधवा सा बना दिया। 

क्या इन 2 लाख नरपशुओं में एक भी इंसान शेष है। जो सक्षम हो, जो योग्य हो। मुझे बस एक पुत्र चाहिए। द्रोण नहीं चाणक्य चाहिए। द्रोण तो कौरवों को भी शिक्षा दिया करते हैं। मुझे सिर्फ चाणक्य चाहिए, जो चंद्रगुप्त का सृजन करे। जो शिखा खोलकर संकल्प ले कि जब तक मेरी दुर्दशा करने वालों को दण्डित नहीं कर देगा, जब तक मुझे प्रेम करने वालों को पदासीन नहीं कर देगा, तब तक शांत नहीं बैठेगा। जिसे सिंहासन से नहीं, मुझसे प्रेम होगा। क्या कोई जिंदा है, जो मेरी बात सुन सकता है। 
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लेखक: ललित मुदगल, शिवपुरी के युवा पत्रकार हैं। 
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