पढिए क्षमापर्व की महत्ता मुनिश्री 108 अभय सागर जी के श्रीमुख से

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शिवपुरी। व्रत, उपवास, पूजन आदि करने का नाम धर्म नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा के स्वभाव में रहने का नाम धर्म है। समय समय पर आने वाले विभिन्न पर्व एवं त्योहार हमें बताते हैं कि किस प्रकार हम अपनी आत्मा का उत्थान करें।

आज उत्तम क्षमा धर्म हमें सिखा रहा है कि प्राणी-मात्र के प्रति हम अपने मन में दया और क्षमा का भाव रखें। क्रोध करना तो सरल है पर क्षमा करना बहुत मुश्किल होता है। क्षण भर का क्रोध जीवन को नष्ट करनें में कारण हो सकता है।

अत: इन दस लक्षण पर्व के दिनों में हम प्रयास करें कि हमारे जीवन से कषायों का दमन होता चला जाये। उक्त उद्गार स्थानिय महावीर जिनालय में उत्तम क्षमा दसलक्षण धर्म के अवसर पर वहाँ चार्तुमास कर रहे पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री अभय सागर जी महाराज, पूज्य मुनिश्री प्रभातसागर जी महाराज एवं पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने दिये।


प्रारंभ में पूज्य मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने दसलक्षण पर्व की व्या या करते हुये कहा कि- दसलक्षण पर्व चैत्र, माघ तथा भादों के महिनों में वर्ष में तीन बार आते हैं।


जैन समाज में मनाये जाने वाले कुछ पर्व शाष्वत होते हैं कुछ नैमित्तिक होते हैं तथा कुछ त्रैकालिक होते हैं। दसलक्षण, अष्टान्हिका आदि शाष्वत पर्व होते हैं। इन पर्वों के माध्यम से हमें अपनी विषुद्वी बढ़ाना चाहिये।


पूज्यश्री ने उत्तमक्षमा धर्म की व्या या करते हुये कहा कि व्रत, उपवास, पूजन आदि करने का नाम धर्म नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा के स्वभाव में रहने का नाम धर्म है। अगर हम किसी को रोटी न दे सकें तो कोई बात नहीं परंतु किसी की रोटी छीनने का प्रयास न करें।

 क्रोध करना वहुत सरल है परंतु क्षमा भाव धारण करना अत्यंत कठिन कार्य है। क्रोध अज्ञानता से प्रारंभ होता है और पश्चाताप पर समाप्त होता है। इस क्रोध के कारण न जाने कितने घर बर्बाद हो गये।

इन दस दिनों में हम अपनी कषायों का दमन करना सीखें और मन में क्षमा भाव धारण करें तभी धर्म हमारे जीवन में आयेगा। और दसलक्षण पर्व मनाना सार्धक होगा।

पूज्य मुनि श्री प्रभातसागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में कहा कि- धर्म दिखाने का नाम नहीं है वरन् धर्म अंतरंग से जाग्रत होना चाहिये। जितना हम अपने परिणामों को निर्मल करेंगे उतना धर्म हमारे जीवन में आता चला जायेगा।

क्रोध करना आत्मा का स्वभाव नहीं विभाव है, हम अधिक देर तक क्रोध में नहीं रह सकते। अत: निज स्वभाव में रहना ही धर्म है। मुनिश्री ने आगे कहा कि कभी भी मंदिर में और भोजन करते समय क्रोध नहीं करना चाहिये। भोजन करते समय यदि क्रोध किया तो भोजन विष का कार्य करेगा। अत: निज स्वभाव में रहते हुये हमें क्रोध को जीतने का कार्य करते रहना चाहिये।
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