आखिर स्व. सुशील बहादुर अष्ठाना के नाम पर सफेदा फेरने का कार्य किसने किया!

अशोक कोचेटा@प्रसंगवश/शिवपुरी। 25 साल बाद एक बार फिर से भारतीय जनसंघ और भाजपा के मजबूत स्थानीय नेता सुशील बहादुर नेता फिर से चर्चा में हैं। अंतर है तो सिर्फ इतना कि सन 89 में वह जीवित थे, लेकिन आज वह इस दुनिया में नहीं हैं।

लेकिन 1989 में भी उनके जीवित रहते हुए भी मौका ऐसा आया था कि उनके नाम पर सफेदी फेरने का प्रयास चल रहा था और आज उनके नाम पर सफेदी फेरी जा चुकी है। भूल कहां हुई? सन 89 में जो दुर्भाग्य घटित नहीं हुआ वह आज क्यों हुआ और कैसे हुआ? वह भी उस स्थिति में जबकि सुशील बहादुर अष्ठाना हमारे बीच नहीं हैं।

बात आगे बढ़े उसके पहले क्या आप इस बात से असहमति जाहिर करेंगे कि जिंदगी बदलने वाला एक एहसान एक उपकार इतना अमूल्य होता है कि पूरी जिंदगी उसकी कीमत को नहीं चुकाया जा सकता और उपकार को भुलाना तो एक अक्ष य अपराध है। आज ठीक मौका है कि हम अतीत के झरोंखों में झांके और देखें कि कल जो नहीं हुआ आज कैसे हो गया?

स्व. सुशील बहादुर अष्ठाना के परिजन और इस क्षेत्र की जनता को क्या यह याद दिलाने की जरूरत है कि उस समय देवदूत के समान कौन अष्ठाना क रक्षा कवच बनकर आया था। सन् 89 में भले ही सुशील बहादुर अष्ठाना भाजपा टिकट के मजबूत दावेदार थे, लेकिन पार्टी ने उनकी दावेदारी को खारिज कर युवा विनोद गर्ग टोडू को टिकट दे दिया था। स्व. अष्ठाना ने पार्टी के विरूद्ध विद्रोह का झण्डा बुलंद कर निर्दलीय रूप से शिवपुरी से विधायक पद का चुनाव लडऩे का शंखनाद कर दिया था।

पार्टी का चुनाव चिन्ह कमल विनोद गर्ग टोडू को मिल चुका था और स्व. अष्ठाना को तीर-कमान चुनाव चिन्ह आवंटित हुआ था। तब स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया अष्ठाना परिवार के समक्ष एक देवी के रूप में अवतरित हुईं। उन्होंने पार्टी को विवश किया कि वह स्व. अष्ठाना को पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी घोषित करे। ऐसा हुआ भी। अब सवाल यह था कि अष्ठाना को चुनाव कैसे जिताया जाए? स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया के मन में यह दुविधा थी कि वह पार्टी के अधिकृत चुनाव चिन्ह के विरोध में कैसे प्रचार करें? इसका हल भी उन्होंने निकाला।

उस समय यशोधरा राजे सिंधिया राजनीति में नहीं थीं। वह अमेरिका में अपने घर परिवार में व्यस्त थीं, लेकिन मां की इच्छा और आदेश का पालन करते हुए वह शिवपुरी आईं और उन्होंने स्व. सुशील बहादुर अष्ठाना को जिताने का बीड़ा उठाया। आज तो स्व. अष्ठाना के सुपुत्र अनुराग अष्ठाना को यह ठीक से याद भी नहीं होगा कि यशोधरा राजे ने उस समय कितनी जलालत, अपमान और पीड़ा भुगती। इसका यदि उन्हें एहसास होता तो वह कदापि यशोधरा राजे की शान के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते।

मुझे याद है कि टोडू के समर्थकों ने कहा कि यह राजमाता की पुत्री नहीं, ब बई से किसी फिल्म अभिनेत्री को लेकर आए हैं और बता रहे हैं राजमाता की सुपुत्री। न जाने क्या-क्या यशोधरा राजे के बारे में कहा गया। इतना कुछ कहा गया कि उसे ठीक-ठीक लिखने की हि मत भी नहीं हो रही। भीषण गर्मी में उस समय की युवा राजकुमारी ने खूब पसीना बहाया। मई और जून की लपटों के बीच कांच रहित खराब से खराब गाड़ी में यशोधरा राजे ने स्व. अष्ठाना के लिए प्रचार किया और उन्हें 18000 से अधिक मतों से जिताकर एक नया इतिहास बनाया।

वह भी उस स्थिति में जबकि संघ के अधिकांश लोग विनोद गर्ग टोडू के प्रचार में जुटे हुए थे। शिवपुरी की भाजपा राजनीति में पूरी शान के साथ सुशील बहादुर अष्ठाना का नाम फिर नए सिरे से लिखा गया। इस एक घटनाक्रम से अष्ठाना परिवार आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से बहुत मजबूत हुआ। अष्ठाना की जीत पूरे परिवार को संवारने वाली बन गई। उस समय कच्चा घरोंदा था। फिर स्व. अष्ठाना के दोनों पुत्र सब इंस्पेक्टर बनने में सफल रहे। अकेले अनुराग अष्ठाना थे वह छोटी-मोटी ठेकेदारी कर रहे थे।

उनकी पत्नी रिशिका अष्ठाना एक स्कूल में प्रायवेट शिक्षक थीं, लेकिन यशोधरा राजे की भूमिका खत्म नहीं हुई थी। भाजपा राजनीति की मु य धारा में वह फिर अनुराग को लाईं और उन्हें भाजपा का नगर अध्यक्ष बनाया। पांच साल पहले 2009 में नगरपालिका अध्यक्ष पद सामान्य वर्ग महिला के लिए आरक्षित हुआ तो टिकट दिलाने से लेकर जीत में यशोधरा राजे की अहम भूमिका रही। यशोधरा राजे खुद चुनाव नहीं लड़ रही थीं।

लेकिन पूरा चुनाव उन्होंने ऐसे लड़ा मानो वह खुद मुकाबले में हों अन्यथा उन्हें क्या जरूरत थी कि वह रिशिका अष्ठाना के प्रचार के लिए अमेरिका से अपने सुपुत्र अक्षय राजे को लेकर आतीं। उस चुनाव में रिशिका अष्ठाना जीतीं तो उसका श्रेय सिर्फ यशोधरा राजे और अक्षय राजे की संयुक्त मेहनत को ही दिया जा सकता है।

इसके बाद भी सवाल सिर्फ यही है कि क्या यशोधरा राजे के खिलाफ या उनकी शान में एक शब्द भी बोलना अनुराग अष्ठाना और रिशिका अष्ठाना के लिए उचित है? सवाल यह भी है कि क्षेत्र में अपने कामों के कारण गरिमा और प्रतिष्ठा रखने वाले स्व. सुशील बहादुर अष्ठाना के नाम पर किसने सफेदा फेरा है? सवाल यह भी है कि क्या अनुराग का यह बयान उचित है कि यदि मेरे पिता के नाम पर सफेदा फेरा गया है तो स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया के नाम पर भी सफेदा फेरा जाए? क्योंकि उसी कथित रूप से निरस्त प्रस्ताव में बस स्टेण्ड का नामकरण राजमाता विजयाराजे ङ्क्षसधिया के नाम पर हुआ था। 


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