दुर्जन की संगति सर्प से भी ज्यादा खतरनाक: मुनि कुन्थुसागर

shailendra gupta
शिवपुरी- संसार में जो किये गये उपकार को भूल जाये उसे दुर्जन कहा जाता है। दुर्जन की संगति कोयले की भांति होती है उसकी संगति करने से भविष्य अंधकारमय हो जाता है, और सज्जन की संगति चंदन के समान होती है जिसकी संगति भविष्य को भी सुगंधित कर देती है।
दुर्जन की संगति सर्प से भी ज्यादा खतरनाक होती है, सर्प अगर काट ले तो मात्र जीवन समाप्त होता है। परंतु दुर्जन की संगति तो जीवन ही नहीं यष, कीर्ती, गुण सब कुछ नष्ट कर देता है। याद रखना उपकारी के उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिये। जिस समाज में तुमने जन्म लिया है। उस समाज की एकता केा बढ़ाने में जो सहायक होते हैं वो सज्जन की भांति होते है। वो समाज के लिये अपना सर्वस्व दे दिया करते है। 

ख्याल रखना दुनिया में प्रत्येक पाप का तो प्रायचित्त हो सकता है परंतु जो समाज को, देश को तोडऩे का काम करता है, ऐसे दुर्जन को के लिये कोई प्रायचित्त नहीं हो सकता। उक्त उदगार मुनि श्री 108 कुंथु सागर जी महाराज ने स्थानिय चंद्रप्रभु जिनालय में अपने बिषेष रविवारिय मंगल प्रवचनों के दौरान दिये।

मुनिश्री ने आगे कहा कि मात्र एक षकुनी के कारण पूरा महाभारत खड़ा हो गया। ना जाने आज कैसे हो गये हैं इस समाज के भाव। भाई भाई से चल रहे है, षकुनी जैसे दांव। अरे परिवार को समाज को तोडऩे से बचाना चाहते हो तो मन में युधिष्ब्रि के जैसे भाव रखो। वो कहते थे कि घर में हम चाहे सौ कौरव और पांच पांडव हों परंतु वाहर हम एक सौ पांच है। कोई बाहर बाला आकर हमें तोड़ नहीं सकता। 

परिवार को और समाज को टूटने से बचाना चाहते हो तो मात्र इतना करना कि मतभेद तो कोई बात नहीं, पर मनभेद न रखें। जब भी परिवार में कोई कार्यक्रम होता है आपसी मनमुटाब छोड़कर एक हो जाना चाहिये।  ज्ञात हो कि मुनिश्री का मंगल चार्तुमास स्थानिय श्री चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में चल रहा है। जिसमें प्रति दिन प्रात: 8:30 पर महाराज श्री द्वारा पुरूषार्थ सिद्वी उपाय की क्लास व सांय 6:15 पर गुरूभक्ति की जाती है।


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