कागजों में उगाए खेत, जिले में मृदा परीक्षण के नाम पर फर्जीवाड़ा उजागर

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करैरा। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी सॉइल हेल्थ कार्ड योजना में करैरा तहसील से बड़े स्तर पर घोटाले का मामला सामने आया है। मृदा परीक्षण के नाम पर फर्जी किसानों और काल्पनिक खेतों के आधार पर हजारों रिपोर्ट तैयार कर शासन को लाखों रुपए की चपत लगाने के आरोप लगे हैं। इस पूरे प्रकरण ने न केवल सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि किसानों के हितों के साथ गंभीर खिलवाड़ भी उजागर किया है।

निजी लैब में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं
करैरा में संचालित मृदा परीक्षण प्रयोगशाला, जिसे एक निजी एजेंसी के माध्यम से संचालित किया जा रहा है, जांच के घेरे में है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि एक ही किसान के नाम पर एक ही दिन में कई मृदा परीक्षण रिपोर्ट जारी कर दी गईं। इतना ही नहीं, कई रिपोर्टों में ऐसे सर्वे नंबर दर्ज किए गए जो संबंधित गांवों में अस्तित्व में ही नहीं हैं।

सूत्रों के अनुसार पिछले एक वर्ष में लगभग 3600 मृदा परीक्षण रिपोर्ट तैयार की गईं। प्रत्येक रिपोर्ट पर केंद्र सरकार द्वारा करीब 300 रुपए का भुगतान किया जाता है। इस आधार पर लाखों रुपए के गबन की आशंका जताई जा रही है। आरोप है कि ठेकेदार द्वारा फर्जी परीक्षण कर बड़ी संख्या में सॉइल हेल्थ कार्ड जारी किए गए।

फर्जी सर्वे नंबर और एक जमीन के कई कार्ड
मामले का खुलासा तब हुआ जब ग्राम जरगंवा अब्बल के एक किसान मुन्ना आदिवासी के खेत की रिपोर्ट की जांच की गई। 19 मई 2025 को लिए गए सैंपल की रिपोर्ट में सर्वे नंबर 1711 दर्शाया गया, जबकि गांव में कुल सर्वे नंबर ही 612 हैं। यानी जिस जमीन का रिकॉर्ड दिया गया, वह गांव में मौजूद ही नहीं है।

इसी तरह, सीताराम आदिवासी के नाम पर एक ही जमीन (सर्वे क्रमांक 200/2) के लिए तीन अलग-अलग सॉइल हेल्थ कार्ड जारी कर दिए गए। मछावली, जुझाई करैरा और टोड़ा करैरा जैसे गांवों में भी बड़ी संख्या में संदिग्ध रिपोर्ट सामने आई हैं। कई मामलों में एक ही किसान के नाम पर एक ही तारीख में तीन अलग-अलग परीक्षण रिपोर्ट जारी की गई, जो सीधे तौर पर फर्जीवाड़े की ओर इशारा करती हैं।

जिम्मेदारी से बचते अधिकारी और ठेकेदार
इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी और लैब संचालक एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते नजर आ रहे हैं। कृषि विभाग के एसएडीओ फूल सिंह हिँडौरिया का कहना है कि लैब संचालन से उनका कोई संबंध नहीं है और सैंपल किसान स्वयं लाते हैं। वहीं, लैब संचालक नीतेश चतुर्वेदी का दावा है कि उन्हें जो सैंपल मिलते हैं, वे केवल उनका परीक्षण करते हैं और सैंपल कृषि विभाग के कर्मचारी उपलब्ध कराते हैं।

जांच के आदेश, कार्रवाई पर टिकी नजर
उपसंचालक कृषि पान सिंह करोरिया ने कहा है कि यदि कहीं अनियमितता या फर्जीवाड़े की शिकायत सामने आती है तो उसकी जांच कराई जाएगी। फिलहाल प्रारंभिक जानकारी के आधार पर मामले की जांच शुरू कर दी गई है। यदि जांच में लापरवाही या गड़बड़ी साबित होती है तो संबंधितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

यह मामला साफ तौर पर दर्शाता है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में निगरानी की कमी किस तरह भ्रष्टाचार को जन्म देती है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस घोटाले में दोषियों पर क्या कार्रवाई करता है और किसानों का भरोसा कैसे बहाल किया जाता है।
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