काश मंदिरों में बढ़ती भीड़ की तरह धार्मिकता भी बढ़ जाती: जैन संत राममुनि | SHIVPURI NEWS

Updesh Awasthee
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शिवपुरी। आज मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और गिरजाघरों में जितनी भीड़ दिखाई देती है उतनी पहले कभी नहीं दिखाई गई। चाहे जैन तीर्थ शिखर जी हो या वैष्णों देवी अथवा स्वर्ण मंदिर हर तीर्थस्थल और प्रमुख धार्मिक स्थानों पर भीड़ का सैलाव उमड़ता हुआ दिखाई देता है। लेकिन दुर्भाग्य से उस अनुपात में दुनिया में धार्मिकता नहीं बढ़ पाई। यह विचार प्रसिद्ध जैन संत राममुनि ने आज पोषद भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा में विकास मुनि भी उपस्थित थे। 

धर्मसभा में संत राममुनि ने स्पष्ट किया कि धर्म प्रदर्शन की नहीं बल्कि आत्मदर्शन की विधि है। इसके जरिए आत्मा का रूपांतरण होता है, लेकिन यदि हम धर्म करते हैं तो उसके लिए भी यश, मान और सम्मान की आकांक्षा रहती है। उन्होंने कहा कि धर्म का सांसारिक वैभव से दूर-दूर का भी संबंध नहीं है, लेकिन चूंकि धर्म सांसारिक वैभव, धन, संपत्ति, यश, प्रतिष्ठा और मान सम्मान के लिए अधिकतर लोगों द्वारा किया जाता है इस कारण वह जो चाहते हैं उन्हें मिल जाता है। लेकिन मूल बात पीछे छूट जाती है। कहा जा रहा है कि पहले चमत्कार होते थे। तपस्वियों में इतनी सामर्थ्य होती थी कि उनके संपर्क में आने से अग्नि शीतल जल में बदल जाती थी, शूली का सिंहासन बन जाता था, लेकिन आज यह सब इसीलिए नहीं हो रहा, क्योंकि धर्म के प्रति हमारी श्रृद्धा उतनी सघन नहीं है। 

धर्मात्मा को देवता भी करते हैं नमस्कार
गुणात्मक रूप से देवता की तुलना में धर्मात्मा श्रेष्ठ होता है। सच्चे धार्मिक व्यक्ति को देवता भी नमस्कार करते हैं। क्योंकि देव भले ही भौतिक वैभव का धनी हो, लेकिन आध्यात्मिक शक्ति के नाम पर वह शून्य होता है और देवता भी मनुष्य भव की आकांक्षा करते हैं, लेकिन हम भौतिक सुख सुविधाओं के लिए देवी देवताओं के हाथ जोड़ते हैं। 

हमारा शिक्षा पर जोर है संस्कारों पर नहीं 
जैन संत राममुनि ने इस बात को दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि प्रत्येक माता पिता अपने बच्चे को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाना चाहता है। उसे डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, एमबीए, कलेक्टर आदि बनाना चाहता है, लेकिन बच्चे को अच्छे संस्कार मिले और वह अच्छा इंसान बने इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। यहीं कारण हैं कि आज की युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित हो रही है। उन्होंने कहा कि बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ वह संस्कारित भी करें। 
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