किसी का घर उजड़ता है, कोई खुशियां मनाता है


शिवपुरी। साहित्यिक संस्था जनवादी लेखक संघ की मासिक काव्य गोष्ठी इस माह रफीक इशरत ग्वालियरी के निवास पर आयोजित हुई। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार अरुण अपेक्षित ने की। झांसी से आए शायर शकील झांसवी विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे। गोष्ठी का संचालन सत्तार शिवपुरी ने किया। गोष्ठी से पहले अगले माह के लिए तरही मिसरे का ऐलान संयोजक सुकून शिवपुरी ने किया-


''मजलूम की आहों से पत्थर भी पिघलते हैं,''
गोष्ठी का आगाज उभरते शायर जनाब साजिद अमन की गजल से हुआ - 
मिट्टी के पुतले सूरत बदलते नहीं,
टूट जायें अगर फिर वो जुड़ते नहीं।
जनाब भगवानसिंह यादव कहते हैं -
तुमसे कोई गिला नहीं हमको खुश रहो तुम दुआ हमारी है,
मौत से कब कहां बचा कोई आज तेरी तो कल हमारी है। 
जनाब रामकृष्ण मौर्य मयंक के जज्बात् देखें -
गम गले से लगाये हुए हैं,
फिर भी हम मुस्कराये हुए हैं। 
जनाब इरशाद जालौनवी ने माहौल को दोस्ताना बनाते हुए बातरन्नुम फरमाया - 
करेंगी हमें याद नस्लें हमारी,
चलो हम लगायें शजर दोस्ती का। 
जनाब जगदीश दर्द ने अपना दर्द कुछ इस तरह बयान किया-
नहीं जानता कोई मेरी हकीकत,
मैं कैसा हूँ मेरा खुदा जानता है।
न उम्मीद करना वफाओं की उससे,
दगाबाज तो बस दगा जानता है।। 
जनाब याकूब साबिर ने गजलकारों को संबोधित करते हुए कहा -
पत्थर जिगर को मोम बना कर गजल कहो,
दीवार नफरतों की गिरा कर गजल कहो। 
लाना बहुत जरूरी है दुनियां में इन्कलाब,
अपने कलम को खूं में डुबा कर गजल कहो।।
डॉ. जनाब अजय ढींगरा ने भी अच्छे शेर पढ़े - 
उनकी ऊंची दुकान, रहने दो,
कितने हैं वो महान, रहने दो।
आपकी उलझनों का मंत्री जी,
कल करेंगे निदान, रहने दो।।
संचालन कर रहे जनाब सत्तार शिवपुरी के शेर भी कुछ कम न थे - 
ये दुनियां हैं यहां हर एक मौसम रास आता है,
किसी का घर उजड़ता है, कोई खुशियां मनाता है। 
संयोजक सुकून शिवपुरी ने अपनी नज्म में धार्मिक आतंकवाद का बिरोध करते हुए इस्लाम की सच्ची तस्वीर पेश की - 
प्यार, मोहब्बत, अपनापन हो ये इस्लाम सिखाता है,
जान से प्यारा अपना वतन हो ये इस्लाम सिखाता है। 
दुनियां में सब चैनो-अमन हो ये इस्लाम सिखाता है,
कोई दुश्मनी ईसा से न बैर कोई है राम से,
अपनी खूंरेजी को तुमने जोड़ दिया इस्लाम से।।
जनाब दिनेश वशिष्ठ अपने चिरपरिचित रंग में नजर आए -
हर मोड़ पे मिला जो बशर गमजदा मिला,
नफरत की आंधियों को हवा दे के क्या मिला।
उस्ताद शायर जनाब इशरत ग्वालियरी ने सियासतदानों पर तीखे प्रहार किये- 
खुदा के नाम से मतलब, न प्रभु से गरज उनको,
धर्म के नाम पर हमको जो आपस में लड़ाते हैं।।
झांसी से तशरीफ लाये जनाब शकील झांसवी ने खूब दाद बटोरी - 
सच बोलने का आप इरादा तो कीजिए,
झूठे न ठहर पायेंगे सच्चाईयों के बीच। 
वो जर - जमीन मुझको न देना मेरे खुदा,
जो डाल दे फसाद मेरे भाईयों के बीच।।
अंत में अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि जनाब अरूण अपेक्षित ने अपनी पीड़ा कुछ इस तरह बयान की -
सभी न्यायालय आपके, आपके कारागार,
हम अपराधी जन्म के, हुकुम करो सरकार।
पद की गरिमा ने दिया, सिर्फ  तुम्हें सम्मान,
वरना कुछ कम तो नहीं पास हमारे ज्ञान।।
आखिर में इशरत ग्वालियरी ने सभी का शुक्रिया अदा किया। 
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