शिवपुरी। भृगु दुनिया के सबसे बड़े और प्रमुख वैज्ञानिकों में से एक थे। अग्रि का आविष्कार भृगु ने किया इसका वर्णन ऋग्वेद के पहले मंडल में है। इसके संबंध में 30 ऋचाएं हैं। इनमें कहा गया है कि जल के भीतर अग्रि है।
हम जानते हैं कि जल का औसत तापमान 97 डिग्री होता है। समुद्र से भी ज्वालामुखी फूटते हैं। जिनसे अग्रि की प्रचंड ज्वाला निकलती है। पश्चिम का जो विज्ञान है महज 200 साल के भीतर की देन है। जबकि भारत का प्राचीन विज्ञान 7 हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। यह बात मानस भवन में भगवान परशुराम कथा के कह रहे पं. रमेश शर्मा ने कथा के तीसरे दिन कही।
श्री शर्मा ने कहा कि ऋग्वेद में 1000 कीर्ति अश्वों से जुड़े रथ का आसमान में उडऩे का वर्णन है। तय है यह घोड़ा गाड़ी धरती पर नहीं चल सकती थी। इसी तरह 100 अश्वों का रथ पानी पर भी चलने का वर्णन है।
सच्चाई यह है कि आज हम जिस अश्व शक्ति को हॉर्स पॉवर के के रूप में जानते हैं, वहीं अश्व शक्ति किसी ऐसी मैकेनिकल तकनीक से जुड़ी हुई थी जिसमें अश्व शक्ति का तापत्र्य ऊर्जा से है। श्री शर्मा ने स्वयंवर पर परा का वर्णन करते हुए कहा कि हमारे देश में स्त्रियों का सबसे ज्यादा स मान था। इसीलिए स्त्रियों को स्वयंवर के माध्यम से वर चुनने का अधिकार था।
राजा रेणु ने अपनी पुत्री रेणुका के लिए भी स्वयंवर का आयोजन किया था जिसमें देश विदेश के महारथी एवं विद्वान आए थे। किन्तु रेणुका ने भृगु ऋषि जमदग्रि को चुना। इन्हीं से परशुराम जन्मे जो अपने उदात्त चरित्र और श्रेष्ठ कर्म के कारण छठे अवतार कहलाए।
इनके कार्यों का विस्तार त्रेता युग से द्वापर तक फैला हुआ है। लोग ऋषियों को क्रोधित व्यक्ति के रूप में जानते हैं जबकि वास्तव में न तो जमदग्रि क्रोधी ऋषि नहीं थे और न ही परशुराम क्रोधी थे। एक बार क्रोध ने जमदग्रि की परीक्षा ली और क्रोध दूध के गिलास में प्रवेश कर विलीन हो गए।
लेकिन ऋषि ने क्रोध को पहचान लिया तब क्रोध प्रगट हुए और ऋषि को अपना अंश धारण करने को कहा, किन्तु ऋषि ने सात्विक, तामसिक एवं राजसिक तीनों ही गुणों के अंश धारण करने से मना कर दिया। तब क्रोध ऋषि को कल्याण का वरदान देकर चले गए।


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