शिवपुरी। शिवपुरी के एक युवा कानून छात्र की आवाज अब देश की न्यायिक व्यवस्था के एक बड़े फैसले का हिस्सा बन गई है। सिविल जज बनने का सपना देखने वाले कानून स्नातकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे हजारों युवाओं के लिए रास्ता आसान कर दिया है। खास बात यह है कि इस महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई में शिवपुरी के नमन शर्मा भी याचिकाकर्ताओं में शामिल थे।
नमन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क रखा कि सिविल जज की परीक्षा में शामिल होने से पहले तीन साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य करना उन युवाओं के साथ अन्याय है, जो कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधे न्यायिक सेवा में जाना चाहते हैं। उनकी दलील में महिलाओं, दिव्यांगों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और पहली पीढ़ी के वकीलों की मुश्किलों को प्रमुखता से उठाया गया।
तीन साल का अनुभव घटकर अब एक साल
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की एंट्री लेवल न्यायिक परीक्षा से जुड़े अपने मई 2025 के फैसले में बदलाव करते हुए वकालत के तीन वर्ष के अनिवार्य अनुभव की शर्त को घटाकर एक वर्ष कर दिया है। इस फैसले को कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। नए आदेश के मुताबिक न्यायिक सेवा में चयनित अभ्यर्थियों को सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्यभार नहीं दिया जाएगा। उन्हें प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के तौर पर प्रशिक्षण से गुजरना होगा।
चयन के बाद भी होगी कड़ी ट्रेनिंग
सुप्रीम कोर्ट के नए प्रावधान के अनुसार चयनित अभ्यर्थियों को एक साल का अनिवार्य प्रशिक्षण पूरा करना होगा। इस दौरान उन्हें न्यायिक कार्यप्रणाली और व्यावहारिक न्यायिक अनुभव से रूबरू कराया जाएगा। प्रशिक्षण व्यवस्था में छह महीने जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पर्यवेक्षण में लॉ क्लर्क के रूप में काम करना होगा, जबकि शेष छह महीने हाई कोर्ट के किसी कार्यरत न्यायाधीश के अधीन कार्य का अनुभव लेना होगा। यानी अदालत ने प्रवेश की बाधा को कम करने के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण को व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाया है।
शिवपुरी के नमन की दलील बनी चर्चा का हिस्सा
इस मामले की खास बात शिवपुरी से जुड़ी है। याचिका दायर करने वाले लोगों में शिवपुरी के नमन शर्मा भी शामिल थे। नमन ने अपनी याचिका में तीन वर्ष के अनुभव की अनिवार्यता को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद तीन साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य करने से कई प्रतिभाशाली युवाओं के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता कठिन हो जाता है। विशेष रूप से उन्होंने महिलाओं, दिव्यांग अभ्यर्थियों, आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों और पहली पीढ़ी के वकीलों की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए इसे असमान अवसर से जोड़कर देखा।
एक नियम, कई सवाल और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
न्यायिक सेवा में जाने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए परीक्षा की तैयारी अपने आप में चुनौतीपूर्ण होती है। इसके साथ यदि परीक्षा में बैठने से पहले कई वर्षों का व्यावहारिक अनुभव अनिवार्य हो, तो कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधे न्यायिक सेवा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के सामने अतिरिक्त बाधा खड़ी हो जाती है। इसी मुद्दे को लेकर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने अपने पूर्व निर्णय में बदलाव करते हुए तीन साल के अनुभव की शर्त को घटाकर एक वर्ष कर दिया।
2-1 के बहुमत से आया फैसला
यह महत्वपूर्ण फैसला प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन** की पीठ ने 2-1 के बहुमत से सुनाया। फैसले के बाद अब कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा की एंट्री लेवल परीक्षा में शामिल होने का रास्ता पहले की तुलना में अधिक सुगम हो गया है। हालांकि चयन के बाद प्रशिक्षण की व्यवस्था के जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि नए न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव भी मिले।
शिवपुरी के लिए क्यों खास है यह फैसला
देश की न्यायिक व्यवस्था से जुड़े इस बड़े फैसले में शिवपुरी के नमन शर्मा का याचिकाकर्ता के रूप में शामिल होना जिले के लिए भी महत्वपूर्ण है। एक स्थानीय युवा द्वारा राष्ट्रीय स्तर के कानूनी मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाना और उस बहस का सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हिस्सा बनना निश्चित रूप से चर्चा का विषय है। नमन की दलील का मूल सवाल था-क्या न्यायिक सेवा में प्रवेश की योग्यता प्रतिभा और परीक्षा से तय होनी चाहिए या परीक्षा से पहले का लंबा अनुभव भी अनिवार्य होना चाहिए?
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