पप्पू सिठेले पोहरी। मानते और कहते है कि मेडिकल इमरजेंसी में एक एक मिनट की कीमत होती है,लेकिन इस घटना के अंदर झाँके तो सिस्टम की लापरवाही के कारण एक मॉ की कोख ही नवजात की कब्र बन गई। एंबुलेंस का 1 घंटे का इंतजार और खराब सड़क और अस्पताल का रैफर एक्सप्रेस चलाना,नवजात की धड़कन इस दुनिया मे आने से पहले ही थम गई।
सीधे शब्दों में लिखे तो सिस्टम की लापरवाही ने नवजात की हत्या कर दी,लेकिन मेडिकल भाषा मे यह पुफ्र नही हो सकता है लेकिन डॉक्टरों की मानें तो नवजात की मौत का कारण मॉ की कोख में शिशु की धडकने धीमी पडना बता रहे है,इस इमरजेंसी केस में प्रसूता पोहरी के छर्च गांव से शिवपुरी अस्पताल में 4 घंटे की देरी से पहुंच सकी,समय पर प्रसूता की डिलीवरी नहीं हो सकी और इस कारण नवजात की मौत इस दुनिया मे आने से पूर्व हो गई।
मामला पोहरी विधानसभा के सबसे पिछले क्षेत्र जिसे छर्च बेल्ट कहा जाता है। छर्च थाना सीमा मे आने वाले गल्थुनी मे निवास करने वाली 34 साल की मनीषा जाटव पत्नी गिर्राज जाटव को प्रसव पीड़ा होने पर परिजनों ने छर्च अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच के बाद वहां मौजूद नर्स ने प्रसूता की गंभीर स्थिति देखते हुए तत्काल पोहरी अस्पताल रेफर कर दिया। इसके बाद जननी एंबुलेंस के लिए 108 पर कॉल किया गया, लेकिन करीब एक घंटे तक एंबुलेंस नहीं पहुंची।
परिजन हर मिनट बढ़ती चिंता के बीच एंबुलेंस का इंतजार करते रहे, लेकिन जब कोई मदद नहीं मिली तो गांव के एक स्थानीय व्यक्ति ने अपनी निजी कार उपलब्ध कराई। प्रसूता को उसी कार से 34 किलोमीटर दूर पोहरी अस्पताल ले जाया गया। रास्ता पहले से ही बेहद जर्जर और उबड़-खाबड़ होने के कारण सफर लंबा और पीड़ादायक साबित हुआ। खराब सड़क की वजह से प्रसूता की हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
पोहरी अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने जांच में बताया कि गर्भस्थ शिशु की धड़कन सुनाई नहीं दे रही है। यहां से तेंदुआ की एंबुलेंस बुलाकर प्रसूता को तत्काल जिला अस्पताल शिवपुरी रेफर किया गया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जिला अस्पताल में प्रसव तो हुआ, लेकिन नवजात मृत पैदा हुआ।
पति गिर्राज जाटव का आरोप है कि यदि छर्च अस्पताल से समय पर जननी एंबुलेंस मिल जाती और क्षेत्र की सड़कें अच्छी होती तो उनका बच्चा आज जीवित होता। उन्होंने कहा कि छर्च क्षेत्र लंबे समय से स्वास्थ्य सुविधाओं और आपातकालीन सेवाओं की कमी से जूझ रहा है। एंबुलेंस की देरी और बदहाल सड़क ने उनके परिवार की खुशियां छीन लीं।
यह घटना एक बार फिर ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। मेडिकल इमरजेंसी में जहां एक मिनट की देरी भी जानलेवा हो सकती है, वहां करीब 200 मिनट की देरी ने यह साबित कर दिया कि स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी ग्रामीण इलाकों में लोगों की जान पर भारी पड़ रही है। अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस मासूम की मौत का जिम्मेदार कौन है—समय पर नहीं पहुंची एंबुलेंस, जर्जर सड़कें या फिर वह स्वास्थ्य व्यवस्था, जो जरूरत के समय मरीजों का साथ नहीं दे सकी।
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