चुनावी चर्चा: दम नही है चुनाव फिक्सिंग की खबरो में...

शिवपुरी। 24 फरवरी को सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में एक नहीं बल्कि दो उपचुनाव हो रहे हैं। कोलारस और मुंंगावली के कांग्रेस विधायकों के असामायिक निधन के कारण यह उपचुनाव होने जा रहे हैं, लेकिन अभी से सोशल मीडिया में दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस और भाजपा मुकाबले के बहाने फिक्सिंग का मैच खेल रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक-एक विधानसभा क्षेत्र पर कब्जा करना तय कर लिया है। सोशल मीडिया के दावों पर यदि भरोसा करें तो कोलारस सीट भाजपा के खाते में और मुंगावली सीट कांग्रेस के खाते में जा रही है। आइए देखते हैं सोशल मीडिया के इस दावों में कितना दम हैं। 

सोशल मीडिया में पिछले एक माह से मुकाबला फिक्सिंग की खबरें चल रही हैं। सबसे पहले एक माह पूर्व इस तरह की खबरें आईं। खबरों का आधार यह बताया गया कि किसान सम्मेलन के बाद भाजपा ने कोलारस में पूरी ताकत फूंक दी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ताबड़तोड़ दो तीन दौरे हो गए। पूरी कैबिनेट ने कोलारस में डेरा डाल दिया। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा से लेकर प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार सिंह चौहान और प्रदेश उपाध्यक्ष रामेश्वर शर्मा सहित समूचा संगठन कोलारस जीतने में लग गया। 

जबकि किसान सम्मेलन के बाद कांग्रेस खेमे में सन्नाटा छा गया और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कोलारस की सुध नहीं ली। ठीक इसके विपरीत नजारा मुंगावली विधानसभा क्षेत्र में बताया गया और कहा गया कि भाजपा वहां रूचि नहीं ले रही है।

लेकिन फिर 31 जनवरी को कांग्रेस द्वारा नामांकन के बहाने कोलारस में किए गए शक्ति परीक्षण से उक्त आशय की खबरों को विराम लगा, परंतु फिर पांच दिनों से सोशल मीडिया पर चुनाव फिक्सिंग की खबरें आने लगीं। कारण वही है कि कोलारस में पूरी भाजपा उपस्थित है जबकि कांग्रेस नदारद है। 

कांग्रेस के एकमात्र खेवनहार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने नामांकन के बाद कोलारस की ओर रूख नहीं किया है। इन दावों को यदि सच माना जाए तो निष्कर्ष यह है कि कोलारस और मुंगावली में नूराकुश्ती का खेल चल रहा है और एक-एक सीट दोनों दलों को देने से दोनों की इज्जत बच जाएगी। 

वहीं जयविलास पैलेस और रानी महल दोनों का वर्चस्व कायम रहेगा, लेकिन दावा करने वाले भूल गए कि कोलारस और मुंगावली के उपचुनाव सन 2018 के चुनाव के ठीक पहले हो रहे हैं और इन चुनावों के परिणामों का असर 2018 के चुनाव पर सुनिश्चित रूप से पड़ेगा। 

इसलिए न तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और न ही सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया एक भी सीट खोना चाहेंगे। हालांकि भाजपा के लिए तो एक भी सीट जीतना उपलब्धि है, क्योंकि 2013 के विधानसभा चुनावों में दोनों विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा की पराजय हुई थी। इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी दोनों विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा की पराजय उसी परिमाण में हुई। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जादू सिर चढक़र बोल रहा था। 

ऐसी स्थिति में यदि भाजपा दोनों में से एक भी सीट जीत लेती है तो सुनिश्चित रूप से उसका मनोबल बढ़ेगा, लेकिन भाजपा से ज्यादा 2018 का चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो का संघर्ष है। ऐसी स्थिति में यदि उपचुनाव में कांग्रेस एक भी सीट लूज करती है तो उसकी माइनस मार्किंग अभी से शुरू हो जाएगी। वहीं सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी होने पर भी प्रश्र चिन्ह लगेगा, क्योंकि दोनों उपचुनाव उनके संसदीय क्षेत्र में हो रहे हैं और इन दोनों क्षेत्रों में पिछले चुनाव में कांग्रेस आरामदायक बहुमत से विजयी हुई थी। 

इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में से किसी एक में भी यदि कांग्रेस की पराजय होती है तो इससे सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की अपने संसदीय क्षेत्र में पकड़ कमजोर जाने का संदेश प्रसारित होगा। लेकिन सवाल यहीं है कि इस तरह की खबरें क्यों सामने आ रही हैं। पड़ताल में स्पष्ट हुआ कि इसका एक मात्र कारण यह है कि भाजपा के पास प्रचार में जुटने के लिए पूरी फौैज है। 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं, यशोधरा राजे हैं, पूरा मंत्रिमंडल हैं जबकि संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के खेबनहार सिर्फ और सिर्फ सिंधिया हैं। इसे कांग्रेस का प्लस प्वांइट माना जाए या माइनस प्वांइट, लेकिन इस सच्चाई में भी दम है कि एक अकेले में भाड़ फोडऩे की सामर्थ्य है। 
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