धर्म असंयमी को भी संयमी बना देता है: मुनि अजितसागर

शिवपुरी। धर्म वह होता है, जो असंयमी को भी संयमी बना देता है। इस जीव को अनादि काल से असंयम के संस्कार मिले है, इस कारण उसे संयम ग्रहण करने में डर लगता है। डरना है तो पाप से डरो, असंयम से डरो। असंयम के कारण ही जीवन में आकुलता आती चली जाती है, यही आकुलता पाप का कारण और संसार में भटकाने का कारण है। अत: जीवन में कल्याण चाहते हो तो इस संसार की भटकन को छोडक़र धर्म के मार्ग पर लगो और आस्था से जुडक़र अपने जीवन को सफल बनाओ। उक्त मंगल प्रवनचन संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के परम शिष्य मुनि अजितसागर महाराज ने विषाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिये।

उन्होंने कहा कि इस मनुष्य पर्याय को व्यर्थ ना खोयें। यह मानव जीवन बहुत दुर्लभ है। आज के दिन आप अपने जीवन की कोई ना कोई एक वुराई जरूर छोडकर जाये जिससे आज से ही आपके जीवन में संयम का बीजारोपड़ हो जाये। हमारे धर्म में त्याग को प्रधानता दी गई है, जैन श्रावक अष्टमूलगुण धारी होता है। मद्य-मांस-मधु का त्याग ही मात्र त्याग नहीं है। उसे चाय-गुटका आदि का भी त्याग करना चाहिये। गधे को यदि तम्बाकू खिला दी जाये तो उसके प्राण संकट में पड़ जाते है, और यह मनुष्य सब कुछ खाता चला जाता है। हमारे अन्दर विवेक ही नहीं रहा कि हमे क्या खाना है? अत: कम से कम अपने जीवन को कुछ न कुछ संयमित अवष्य बनायें जिससे सभी का कल्याण हो। 

संयम उपकरण के परिवर्तन के अवसर पर शिवपुरी के अलाबा सागर, इंदौर, बैरसिया, पथरिया, जैसीनगर, विदिशा, दमोह, गंजबासौदा, शाहगढ़, ललितपुर, खातेगांव, खुरई, बीना, मुंगावली, गोटेगांव, भोपाल और अन्य जगहों से भी श्ऱद्धालु बड़ी बड़ी संख्या में लोग शामिल हुये। मुनि अजितसागर को नवीन पिच्छिका अनिल-शीला चौधरी ने भेंट की, वहीं पुरानी पिच्छिका रामस्वरूप-मंजू जैन महरौली को मिली। ऐलक दयासागर महाराज को नवीन पिच्छिका जगदीश-राजकुमारी जैन ने भेंट की, वहीं पुरानी पिच्छिका रतन-मीना जैन को मिली। ऐलक विवेकानंदसागर को नवीन पिच्छिका अशोक-हेमा जैन ने भेंट की, वहीं पुरानी पिच्छिका पवन-कुसुम जैन लुकवासा को मिली।               
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