वो ताल बजाकर पैसे कमाते हैं, ये गाल बजाकर नाम कमाना चाहते हैं

उपदेश अवस्थी/​शिवपुरी। जिले में एक बार फिर बकवास भरी राजनीति शुरू हो गई है। बिना कोई काम करे नाम कमाने के हुनर में महिर कुछ नेता इन दिनों शिवपुरी में सक्रिय हैं। एक और प्रजाति है जो बिना परिश्रम के पैसे कमाती है। वो ताल बजाकर पैसे कमाते हैं, ये गाल बजाकर नाम कमाने में लगे हुए हैं। शिवपुरी आज भी सिसक रही है। सहमी हुई सी एबी रोड के किनारे तपती धूप में प्यासी बैठी हुई है। 

हां, मैं बात उन्हीं नेशनल लेवल के नेताजी की कर रहा हूं जो इन दिनों बीपी डाउन हो जाने के बाद भी टॉफी खाकर बयान दे रहे हैं। गांव-गांव जा रहे हैं। गाल बजा रहे हैं। हर 10 मिनट बाद वो 'किसी महाराज' का जिक्र करते हैं। फिर सन् 57 से आज तक की कहानी का कोई प्रसंग सुनाते हैं। लोग ताजियां बजा देते हैं। चापलूस वाहवाही कर देते हैं, नेताजी गदगद हो जाते हैं। उन्हे लग रहा है कि वो कोई भारी वीरता का काम कर रहे हैं।  3-4 साल पहले भी कहा था वो बाउंड्री गलत बनी है। मर्द थे तो तुड़वा देते। शायद नेताजी रिटायर हो गए हैं। उन्हे मालूम नहीं है कि अब हालात बदल गए हैं। शिवपुरी का बच्चा बच्चा मुखर हो चुका है। अब यहां चंद चापलूसों के अलावा कोई मुजरा नहीं करता। जनता इस तरह की बे-सिर,पैर की बातों पर ध्यान ही नहीं देना चाहती। 

अब यहां मुद्दा है जिले का विकास, प्रगति, तरक्की और रोजगार। बहुत हो गया जिंदाबाद-मुर्दाबाद। अब काम चाहिए। उनके 3 साल पूरे हो गए, इनके 15 साल पूरे होने वाले हैं। चुनाव से पहले गुजरात वाले बाबा आए थे। बोल रहे थे कि शिवपुरी के जलसंकट को मैने भी भोगा है। मुझे मौका मिला तो शिवपुरी से जलसंकट का कलंक मिटा दूंगा। जनता को उस वादे की पूर्ति चाहिए। इस बार जनता ने जलसंकट को लेकर कोई हंगामा नहीं किया। यह बहुत बड़ा संकेत है, कि अब जनता आक्रोशित नहीं है बल्कि बदला लेने का मन बना चुकी है। बस मौके का इंतजार कर रही है। शिवपुरी को अब सड़कें चाहिए, स्कूल और कॉलेज चाहिए। अच्छा अस्पताल चाहिए। रोजगार चाहिए। इसमें से कुछ कर सकते हो तो बताओ। नहीं तो नमस्ते करो और बिहार लौट जाओ। 
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