अपनी खिल्ली उड़वाकर आनंद तो बहुत आ रहा होगा

उपदेश अवस्थी @लावारिस शहर। ऐसी महिलाएं तो बहुत देखी हैं जो परिवार के भीतर खुद का मजाक उड़वातीं हैं लेकिन ऐसी अफसर पहली बार देखी जिसने खुद को सारे प्रदेश में मजाक बना डाला। 4 साल में 5 तबादलों के बाद जिंदगी में पहली बार 45 दिन के लिए मौका मिला था। कुछ ऐसा सकारात्मक हो सकता था जो बेंचमार्क बन जाता लेकिन कागज-कागज खेल डाला। शुरूआत कड़वी जुबान से हुई, अंत कड़वे कागज पर। 

आम आदमी नासमझ हो सकता है। बीए पास क्लर्क भी लकीर का फकीर हो सकता है लेकिन एक खास और देश की बड़ी परीक्षा पास करके, फिर मैदानी स्तर पर ट्रेनिंग लेने के बाद यदि कोई अफसर बचकाने कागजों पर साइन करे तो अजीब लगता है। इन अफसरों को ट्रेनिंग ही इस बात की दी जाती है कि कैसे बिगड़े हुए हालात को अपने अनुकूल बनाएं। यहां तो उल्टा हो रहा है। अनुकूल हालात को अपने हाथ से बिगाड़ते हैं। 

एक खास ट्रेनिंग में इन अफसरों को सिखाया जाता है, मीडिया को मैनेज कैसे करें। नेताओं को कैसे संभालें। और दंगे की आग को कैसे शांत करें। कब लाठी वालों को इशारा करें और कब दंगाइयों के नेताओं को मीटिंग के लिए बुलाएं। बड़े दिमाग का खेल होता है। जिन्होंने कभी 60% के लिए भी मेहनत नहीं की वो समझ नहीं पाएंगे। आसान नहीं होता तमाम बाधाओं को पार करते हुए सभी व्यवस्थाओं को ना केवल दुरुस्त बनाए रखना बल्कि उत्तरोत्तर प्रगति की ओर भी ले जाना। 

इसमें रटंत तोतों की जरूरत नही होती। इसीलिए तो परीक्षा में सामान्य ज्ञान के सवाल ज्यादा होते हैं। कॉमन सेंस चैक किया जाता है और भी बहुत कुछ परखा जाता है परंतु लगता है पोस्टिंग के बाद कोई ऐसा हादसा हुआ कि सारी पढ़ाई और ट्रेनिंग दिमाग से रिमूव हो गई। वरना कोई होशो हवास में तो अपना मजाक उड़वाने वाला कागज साइन नहीं करता। हासिल क्या हुआ 23 फरवरी 2017 को जारी की गई चिट्ठी से। कोई नहीं रुका। ऊपर और नीचे वाले सब शामिल हुए और धूमधाम से कार्यक्रम सानंद सम्पन्न हुआ। वो चिट्ठी पता नहीं किसकी छत पर हेलीकॉप्टर बनकर ठहर गई, या किसी नाले में नाव बनकर बह रही है। 
कोई बताओ यार, बादाम तो आपके बाजार में भी ​मिलती होगी। 
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