जिंदगी का काम तो सूरज उगाना है: साध्वी दिव्य ज्योति जी

शिवपुरी। अधिकांश लोग तो रोजी-रोटी, पद, यश जैसी सांसारिक उपलब्धियां प्राप्त करने में ही जीवन बिता देते हैं, लेकिन समझदार इंसान वहीं है जो जीवन बिताता नहीं, बल्कि बनाता है। जिंदगी का असली काम तो सूरज उगाना है।

उक्त बात प्रसिद्ध जैन साध्वी दिव्य ज्योति जी ने स्थानीय पोषद भवन में आज आयोजित धर्मसभा में व्यक्त की। उन्होंने कहा इंसान चाहे तो अपने जीवन को नर्क और चाहे तो स्वर्ग बना सकता है और चाहे तो स्वयं ईश्वर भी बन सकता है। धर्मसभा में साध्वी समता कुंवर जी भी उपस्थित थीं। जिन्होंने सुमधुर भजनों का गायन किया।

साध्वी जी ने बताया कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति इंसान में अपरिमित क्षमताएं हैं। वह आसमान को छूकर अपने जीवन को पावन बना सकता है वहीं पाताल की गहराईयों में जाकर जीवन को पतित भी कर सकता है। उन्होंने भांति-भांति के मनुष्यों को पड़ा हुआ, खड़ा हुआ, गढ़ा हुआ और तराशा हुआ पत्थर के उदाहरण से स्पष्ट करते हुए कहा कि मनुष्य की निकृष्टता का उदाहरण जमीन में पड़े हुए पत्थर के समान है जो सिर्फ रोड़े का काम करता है और दूसरों के जीवन में व्यवधान उत्पन्न करना ही उसका उद्देश्य होता है।

जबकि खड़ा हुआ पत्थर मील का पत्थर होता है जो दिशा निर्देशन के साथ-साथ यात्रा के मार्ग को भी बताता है। इस प्रकृति के व्यक्ति बहुत अधिक धर्म-ध्यान तो नहीं करते, लेकिन जो कोई भी उनके पास सलाह मशवरे को आता है उसे वह सही राह देते हैं। कम से कम पहले प्रकार से दूसरे प्रकार के व्यक्ति श्रेष्ठ होते हैं, लेकिन तीसरे प्रकार का जो व्यक्ति होता है उसकी प्रकृति जमीन में पड़े हुए पत्थर के समान होती है अर्थात वह नींव का पत्थर होता है।

सारा जगत मंदिर के शिखर और मंदिर की भव्यता की प्रशंसा करता है, लेकिन उस नींव के पत्थर की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता जो उस भव्यता का जनक है, लेकिन इसके बाद भी नींव का पत्थर जिस तरह से अपने कर्तव्यों में संलग्न रहता है उसी प्रकार से तीसरे प्रकार के व्यक्ति वह होते हैं जो बिना प्रशंसा के, बिना राग-द्वेष के सिर्फ अपने कर्तव्यों में लीन रहते हैं।

उन्हें अपने अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्य की अधिक फिक्र रहती है। ऐसे व्यक्ति को यदि अधिकार मिल भी जाते हैं तो उनका उपयोग वह जनहित में करता है। इस तरह के सेवाभावी लोग समाज और परिवार के लिए बहुत उपयोगी होते हैं, लेकिन सर्वश्रेष्ठ इंसान तराशे हुए पत्थर के समान होता है जो छैनी हथोड़े के वार अपने सीने पर लेता है। दुख को अंगीकार करता है और दूसरों को सुख और आनंद देता है। इस श्रेणी में राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर जैसे महामानव होते हैं जिन्होंने तराशे हुए पत्थर के समान अपनी सारी बुराईयों को छांट दिया है और भगवान के रूप में अवतरित हो गए हैं।

साध्वी जी ने कहा कि वैसे तो हमें तराशे हुए पत्थर के समान बनना चाहिए। यदि न बन पाएं तो कम से कम रास्ते के पत्थर के समान तो न बनें। जिसका एक मात्र काम दूसरे के जीवन में व्यवधान उत्पन्न करना है। प्रवचन के अंत में साध्वी जी ने एक कविता के माध्यम से अपनी बात समाप्त की कि ध्यान करो या न करो व्यवधान न बनो, स मान करो या न करो अपमान न करो, सोचो-समझो और विचारो भला करो या न करो पर बुराई न करो।

मकर संक्रांति पर होगा लोग्गस कल्प का अनुष्ठान

मकर संक्रांति 14 जनवरी को सुबह 9:15 से 10:30 बजे तक पोषद भवन में विदुषी साध्वी श्री दिव्याशा श्रीजी म.सा. के आशीर्वाद और गुरू आनंद रत्न शिष्या साध्वी दिव्य ज्योति जी म.सा. की प्रेरणा से सजोड़े लोग्गस कल्प अनुष्ठान की आराधना की जा रही है। जैन समाज द्वारा जारी प्रेस बयान में बताया गया है कि अनुष्ठान में बैठने के लिए पुरूष श्वेत डे्रस एवं महिलाएं लाल चुंदड़ी में आएं।

प्रत्येक पुरूष 9 लोंग एवं महिलाएं 9 चावल (अक्षत) अपने साथ लाएं। अनुष्ठान के लिए ठीक 9:15 के पूर्व पहुंचना अनिवार्य है। अगर पति-पत्नि का जोड़ा न हो तो अकेले पुरूष या स्त्री भी भाग ले सकती है। इस अवसर पर श्री ब्राह्मी महिला मण्डल द्वारा पांच आकर्षक लकी ड्रा भी निकाले जाएंगे। कार्यक्रम के पश्चात स्वल्पाहार की व्यवस्था है।

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